यदि अंतरिक्ष के सफर में किसी वाहन ने भारत का लोहा मनवाया है, तो वो है - ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी). ये मध्यम क्षमता वाला रॉकेट न सिर्फ हमारे पृथ्वी पर्यवेक्षण उपग्रहों को ध्रुवीय कक्षा में पहुँचाता है, बल्कि इसने चंद्रयान और मंगलयान जैसे अनोखे मिशनों को भी सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में पहुँचाने का गौरव हासिल किया है. आज 2023 में भी, पीएसएलवी अपनी मज़बूती और सफलता की गाथा लिख रहा है. आइए, इस चमत्कारिक रॉकेट के बारे में कुछ रोचक बातें जानें:
पीएसएलवी: आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक
1993 में पहली बार सफलतापूर्वक उड़ान भरने के बाद से, पीएसएलवी ने लगभग 37 बार आसमान छूआ है. इनमें से सिर्फ 2 मिशन असफल रहे, जो इसकी 95% से ज़्यादा सफलता दर का प्रमाण है. इस रॉकेट को पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से विकसित किया गया है, जिसका मतलब है, इस पर किसी दूसरे देश की निर्भरता नहीं है. यही बात पीएसएलवी को भारत के आत्मनिर्भर अंतरिक्ष कार्यक्रम का गौरवशाली प्रतीक बनाती है.
ध्रुवीय कक्षा का पथिक
पीएसएलवी को मुख्य रूप से पृथ्वी पर्यवेक्षण उपग्रहों को 550 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित ध्रुवीय कक्षा में स्थापित करने के लिए बनाया गया है. इस कक्षा से उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर लगभग ध्रुवों से होते हुए एक ही तल पर चक्कर लगाते हैं. इससे उन्हें हर 12 घंटे में पूरी पृथ्वी की तस्वीरें लेने की क्षमता मिलती है, जो मौसम की भविष्यवाणी, प्राकृतिक संसाधनों की निगरानी और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में बेहद उपयोगी साबित होती है.
बहुमुखी प्रतिभा का नमूना
पीएसएलवी सिर्फ ध्रुवीय कक्षा तक ही सीमित नहीं है. यह छोटे उपग्रहों को जियोस्टेशनरी कक्षा (भूमध्य रेखा के ऊपर 36,000 किलोमीटर की ऊँचाई पर एक स्थिर कक्षा) तक भी पहुँचा सकता है. इस कक्षा से उपग्रह लगातार एक ही स्थान पर पृथ्वी की ओर मुख करके रहते हैं, जिससे दूरसंचार, टेलीविजन प्रसारण और मौसम की निगरानी के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता है. इतना ही नहीं, पीएसएलवी ने चंद्रयान-1 और मंगलयान जैसे अंतरग्रहीय अभियानों को भी सफलतापूर्वक लॉन्च किया है, जो इसकी बहुमुखी प्रतिभा का जीता-जागता उदाहरण है.
पीएसएलवी: आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक
1993 में पहली बार सफलतापूर्वक उड़ान भरने के बाद से, पीएसएलवी ने लगभग 37 बार आसमान छूआ है. इनमें से सिर्फ 2 मिशन असफल रहे, जो इसकी 95% से ज़्यादा सफलता दर का प्रमाण है. इस रॉकेट को पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से विकसित किया गया है, जिसका मतलब है, इस पर किसी दूसरे देश की निर्भरता नहीं है. यही बात पीएसएलवी को भारत के आत्मनिर्भर अंतरिक्ष कार्यक्रम का गौरवशाली प्रतीक बनाती है.
ध्रुवीय कक्षा का पथिक
पीएसएलवी को मुख्य रूप से पृथ्वी पर्यवेक्षण उपग्रहों को 550 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित ध्रुवीय कक्षा में स्थापित करने के लिए बनाया गया है. इस कक्षा से उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर लगभग ध्रुवों से होते हुए एक ही तल पर चक्कर लगाते हैं. इससे उन्हें हर 12 घंटे में पूरी पृथ्वी की तस्वीरें लेने की क्षमता मिलती है, जो मौसम की भविष्यवाणी, प्राकृतिक संसाधनों की निगरानी और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में बेहद उपयोगी साबित होती है.
बहुमुखी प्रतिभा का नमूना
पीएसएलवी सिर्फ ध्रुवीय कक्षा तक ही सीमित नहीं है. यह छोटे उपग्रहों को जियोस्टेशनरी कक्षा (भूमध्य रेखा के ऊपर 36,000 किलोमीटर की ऊँचाई पर एक स्थिर कक्षा) तक भी पहुँचा सकता है. इस कक्षा से उपग्रह लगातार एक ही स्थान पर पृथ्वी की ओर मुख करके रहते हैं, जिससे दूरसंचार, टेलीविजन प्रसारण और मौसम की निगरानी के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता है. इतना ही नहीं, पीएसएलवी ने चंद्रयान-1 और मंगलयान जैसे अंतरग्रहीय अभियानों को भी सफलतापूर्वक लॉन्च किया है, जो इसकी बहुमुखी प्रतिभा का जीता-जागता उदाहरण है.
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